मंगलवार, 6 अप्रैल 2010

यह कविता मेरी प्रारम्भिक तीन-चार कविताओं में से है और मेरी अत्यन्त प्रिय कविताओं में से एक है। हालाँकि इसका प्रकाशन सिर्फ़ दो ही बार हुआ है।
शायद 1977 में इसे लिखा था मैंने। कविता का शीर्षक है-- ’तुम्हारा रक्तकमल’
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तुम्हारा रक्तकमल
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देखो !
तुम सभी देखो
उस औरत को देखो

मुझे
मालूम है सब-कुछ
उस औरत के विषय में
जिसे उन्होंने रक्तकमल पर खड़ा किया है
तुम्हारा रक्तकमल

उस
औरत के
हाथों से टपकते
चंद चांदी के सिक्के ज़मीन पर

ख़ुश मत हो !
तुम्हारे रक्त से निर्मित
वे सिक्के तुम्हारे नहीं हैं
उनके हैं
जिनके पास रक्तकमल है
तुम्हारा रक्तकमल

वे फेंकते हैं सिक्के तुम्हें
सेकते हैं भट्ठी पर
भूनते हैं माँस-- बोटी टूंगते हैं
शेष बचे रक्त से रक्तकमल उगाते हैं
औरत लाते हैं और
फिर सिक्के गिराते हैं

समझो तुम
फँस मत जाना, सावधान रहना
सिक्के मत उठाना
नहीं तो वे फिर
तुम्हारा रक्त मांगेंगे
नया रक्तकमल उगाने के लिए।

अब
एक काम करो तुम
चाकू बन जाओ
तेज़ी से जाओ-- वार करो
जड़ सहित रक्तकमल काट लाओ
तुम्हारा रक्तकमल।

2 टिप्‍पणियां:

  1. भ्रष्ट सत्ता के ख़िलाफ़ एक भरपूर तमाचा है यह कविता .

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  2. उस देश में देह की मुक्ति है फिर भी औरत को रक्त कमाल बनाना पड़ता है ...चाकू की धार की तरह मन को काटने का दर्द लिए है यह कविता .!!

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